पृथ्वी पर आयुर्वेद का आरम्भ कैसे हुआ ?

Vd. Chandra Chud Mishra , M.D. ( Ayurved ) (National Institute of Ayurveda, Jaipur)

jiyofit19@gmail.com +919068889100

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आयुर्वेद का आरम्भ?

आयुर्वेद को शाश्वत और अनादि माना गया है और इसके अनेकों प्रमाण संहिताओं में में उपलब्ध भी हैं। लेकिन समय समय पर यह प्रश्न उठ जाता है कि आयुर्वेद कितना पुराना है इसकी वैज्ञानिकता क्या है? हालाँकि अगर किसी ने सही से वेदों का अध्ययन किया हो या केवल आयुर्वेद के आर्ष ग्रंथो का अवलोकन किया हो तो उसे इन प्रश्नों का समीचीन उत्तर मिल जाएगा। फिर भी जिन्हें इसका अवसर नही मिला हो उनकी शंका का समाधान कैसे होगा? उन्हें तो आयुर्वेद के आरम्भ और वैज्ञानिकता पर संदेह होना स्वाभाविक है। इस लेख में आयुर्वेद का पृथ्वी पर कैसे अवतरण हुआ इस पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। साथ ही यह भी प्रयास है आयुर्वेद की वैज्ञानिकता की एक छोटी सी झलक भी पाठकों को मिले।

आयुर्वेद की उत्पत्ति या अवतरण ? 

जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं आयुर्वेद शाश्वत और अनादि है। यह प्रामाणिक भी है। चरक संहिता के सूत्र स्थान में 30 वें अध्याय में इसका स्पष्ट वर्णन मिलता है। यहाँ पर प्रमाण के साथ आयुर्वेद के अनादि और शाश्वत होने को समझाया गया है।

आचार्य अग्निवेश के अनुसार आयु का प्रवाह सृष्टि के आरम्भ से प्रलय काल तक निरंतर बना रहना है। वही आयु जिसे सत्व आत्मा और शरीर के संयोग के रूप में परिभाषित किया जाता है और जो आयुर्वेद का आधार विषय है। सारा आयुर्वेद इसी आयु के चारों तरफ़ घूमता है। अब चूँकि आयु शाश्वत और अनादि है तो आयु का वेद भी शाश्वत और अनादि ही होना चाहिए। अतः जो अनादि है उसकी उत्पत्ति नही वरन अवतरण ही होगा। यही कारण है की आयुर्वेद का पृथ्वी पर आरम्भ न कह कर अवतरण कहा जाता है और यह उचित भी है।

आयुर्वेद की पृथ्वी पर आवश्यकता क्यों पड़ी :

एक समय ग्राम्य आहार और अनियमित जीवन शैली के कारण मनुष्यों को अनेक प्रकार के रोग होने लगे। रोगों से त्रस्त मनुष्यों को पुरुषार्थ चतुष्टय ( धर्म, अर्थ, काम मोक्ष ) की प्राप्ति में अनेकों बाधाएँ उत्पन्न होने लगी। दुखी मनुष्य इसका समाधान प्राप्त करने ऋषियों की शरण में जाते। उदार हृदय ऋषि मनुष्यों के कष्टों से बहुत चिंतित हुए।इस समस्या  के समाधान के लिए संसार भर के ऋषियों का एक सम्मेलन बुलाया गया। ठीक वैसा ही जैसा आज के समय में सेमिनार होते हैं। इस गोष्ठी में लगभग 53 ऋषियों ने हिस्सा लिया। ये सभी विभिन्न देशों से आए थे। सबने मिल कर खूब विचार विमर्श के बाद यह निर्णय लिया की इंद्र के पास से आयुर्वेद का ज्ञान पृथ्वी पर लाया जाए तभी इस समस्या से बचा जा सकता है। इस तरह से आयुर्वेद के पृथ्वी पर अवतरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सबसे पहले आयुर्वेद किसने सीखा?

यह निर्णय तो हो गया कि आयुर्वेद को पृथ्वी पर ले आना है लेकिन यह काम कौन करेगा ये अभी भी समस्या बनी रही। पृथ्वी से सशरीर जा कर इंद्र से ज्ञान लेना और वापस पृथ्वी पर आना आसान नही था। काफ़ी मशक़्क़त के बाद ऋषि भारद्वाज के ज़िम्मे यह काम सौंपा गया। इस तरह इंद्र से सीख कर सबसे पहले ऋषि भारद्वाज पृथ्वी पर आयुर्वेद को लाए। उनसे सीख कर अन्य ऋषियों ने आयुर्वेद को सबसे पहले अपने ऊपर प्रयोग किया। हर प्रकार से सही सिद्ध होने पर यह ज्ञान आम जनमानस के हित में प्रयोग किया जाने लगा।

यहाँ तक का क़्रम तो सभी संहिताओं में लगभग एक सा है। लेकिन इसके बाद थोड़ी बहुत भिन्नता देखने को मिलती है। अगर चरक संहिता की बात करें तो ऋषि भारद्वाज के शिष्यों में एक ऋषि आत्रेय हुए। इन्होंने भारद्वाज ऋषि से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर अपने शिष्यों को सिखाया। इनके 6 शिष्य थे जिनके नाम अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, हारीत, क्षारपाणि और पाराशर थे। इन सभी ने आयुर्वेद का ज्ञान ऋषि आत्रेय से पाया और फिर अपनी अपनी संहिताओं की रचना की। इन्ही में से अग्निवेश के द्वारा रचित तंत्र जिसे बाद में और परिष्कारित किया गया आज भी सबसे ज़्यादा प्रचलित है। इसे हम चरक संहिता के नाम से जानते हैं।

निष्कर्ष:

इस प्रकार हम देखते हैं की आयुर्वेद का ज्ञान शाश्वत है। इसे समय की सीमाओं में नही बांधा जा सकता है। जब तक आयु का अस्तित्व है आयु ज्ञान के शास्त्र के रूप में आयुर्वेद का अस्तित्व है। यह केवल चिकित्सा पद्धति नही बल्कि जीवन का शास्त्र है। इस लेख से एक बात और समझ में आती है। आयुर्वेद में भी समस्याओं के समाधान के लिए पहले विस्तृत चर्चा की जाती थी। उसके बाद जी निष्कर्ष होता था उसका पूरी तरह परीक्षण करने के बाद ही उसे जनमानस के हितार्थ प्रयोग होता था। इसके आधार पर हम कह सकते हैं की आयुर्वेद अवैज्ञानिक नही है बल्कि अभी आयुर्वेद के सिद्धांतों को समझने की बुद्धि और संसाधन हमारे पास नहीं हैं। 

*यह लेख केवल आयुर्वेद के प्रचार प्रसार को ध्यान में रख कर लिखा गया है। किसी भी औषधि का प्रयोग योग्य चिकित्सक की देखा रेख में किया जाना चाहिए।

About The Author:-

Vaidya Chandra Chud Mishra is known for his special approach and clinical skills in the field of Ayurveda. He has written many articles on Ayurveda and Yoga. His books written on the subjects of Yoga and Ayurveda are very popular among students and doctors. He has extensive experience in management of life style disorders with comprehensive classical approach of Ayurveda. He has helped many patients to successfully control diabetes, high blood pressure, liver disorders, skin disorders and obesity as per the Ayurvedic lifestyle.For the purpose of propagating Ayurveda, he has organized many camps during his student days. To make his experiences easily known to the society, he started running Jiyofit Ayurved. Apart from this, his hobby is to write regularly on various social media platforms and share content related to Ayurveda.

Presently he is working in the field of Nadi Vigyan, practical application of dietary principals of Ayurveda and treatment of diseases with the integration of Ayurveda and Astrology.

M.D. National Institute of Ayurveda, Jaipur, Rajasthan, 2013

B.A.M.S. Kanpur University, Uttar Pradesh,2006

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References

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