प्राणायाम करने का सही तरीक़ा क्या है ?
Vd. Chandra Chud Mishra , M.D. ( Ayurved ) (National Institute of Ayurveda, Jaipur)
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प्राणायम का परिचय
पातंजल योग सूत्र के अनुसार योग के आठ अंग होते हैं जिन्हें अष्टांग योग के नाम से भी जाना जाता है। प्राणायाम इन्ही में से एक है। हालांकी हठयोग प्रदीपिका में सीधे तौर पर प्राणायाम को योग की अवस्थाओं में नही गिना गया है लेकिन वहाँ कुम्भक का उल्लेख मिलता है। वस्तुतः कुम्भक भी प्राणायाम का एक अंग है। इसी प्रकार योग से सम्बंधित अनेकों ग्रंथों, उपनिषदों में प्राणायाम को योग का एक अभिन्न अंग माना गया है। यही नही आयुर्वेद के ग्रंथों में प्राणायाम का प्रयोग व्याधि के निवारण में भी मिलता है । हिक्का की चिकित्सा में आचार्य सुश्रुत ने प्राणायाम का प्रयोग बताया है।प्राणायामोद्वेजनत्रासनानि सूचीतोदैः सम्भ्रमश्चात्र शस्तः |१६| इस तरह से हम देखते हैं कि प्राणायाम का न केवल साधकों के लिए महत्व है बल्कि जनसामान्य के लिए बीमारियों की चिकित्सा और उनसे बचाव में भी प्राणायाम की उपयोगिता है।
प्राणायाम क्या है ?
जैसा पहले भी बताया गय है प्राणायाम अष्टांग योग का एक अभिन्न अंग है। प्राणायाम शब्द दो शब्दों से बना है प्राण और आयाम। इसका अर्थ है अपनी श्वास प्रश्वास की प्रक्रिया पर नियंत्रण।
याज्ञवल्क्य के अनुसार प्राण और अपान वायु के संयोग को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम कहने से रेचक पूरक और कुम्भक की क्रिया समझना चाहिए।
प्राणापानसमायोग: प्राणायाम इतीरित:।
प्राणायाम इति प्रोक्तो रेचक पूरक कुम्भक:।।
भगवद गीता में कर्मयोग के विषय में बताते हुए भगवान कृष्ण ने प्राणायाम का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। गीता के चौथे अध्याय में भवान कहते हैं कि कई योगी जो नियताहारी होते हैं और नियमित प्राणायाम के द्वारा कर्मयोग करते हैं इनमें से कुछ प्राण का अपान वायु में हवन करते हैं इसे पूरक समझना चाहिए। कुछ योगी प्राण में अपान का हवन करते हैं जिसे रेचक कहते हैं। तीसरे कुछ योगी प्राण का प्राण में ही हवन करते हैं जिसे कुम्भक कहते हैं। इसी तरह पातंजल योग सूत्र में श्वास प्रश्वास की गति के नियंत्रण को प्राणायाम कहा गया है।
अष्टांग योग के आठ अंगों को अगर साधना के आठ चरण माना जाए तो ये क्रमश: साधक को स्वयं पर नियंत्रण प्राप्त करने की प्रक्रिया हैं जिसके द्वारा साधक अपने भिन्न प्रकार विकारों से खुद को बचाते हुए अपनी साधना पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। इसी क्रम में यम से लेकर आसन तक की प्रक्रियाओं के द्वारा साधक शरीर सम्बन्धी विकारों पर नियंत्रण प्राप्त करता है। इसका अगला चरण प्राणायाम है। यहीं से साधक अपने मानसिक विकारों पर विजय प्राप्त कर अपना सारा ध्यान साधना पर केंद्रित करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्राणायाम के द्वारा शारीरिक समस्याओं के साथ साथ मानसिक विकारों का समाधान किया जा सकता है।
प्राणायाम कितने प्रकार का होता है ?
हठ योग प्रदीपिका में प्राणायाम को तीन प्रकार का बताया गया है रेचक, पूरक और कुम्भक।इसी तरह श्रीमद् भगवत गीता में भी रेचक, पूरक और कुम्भक ऐसा तीन प्रकार का प्राणायाम बताया गया है। पातंजल योग सूत्र के अनुसार प्राणायाम बाह्य वृत्ति, आभ्यांतर वृत्ति और स्तम्भ वृत्ति ऐसा तीन प्रकार का होता है। श्वास की शरीर से बाहर की तरफ़ प्रवृत्ति को बाह्य वृत्ति कहते हैं। इसे ही रेचक भी कहते हैं।श्वास की शरीर के अंदर की ओर प्रवृत्ति को आभ्यांतर वृत्ति या पूरक कहते हैं। श्वास की गति को रोक लेने को स्तम्भ वृत्ति या कुम्भक कहते हैं।
प्राणायाम करने का सही तरीक़ा क्या है ?
प्राणायाम करने से पहले नाड़ी की शुद्धि आवश्यक है। घेरंड संहिता के अनुसार अगर नाड़ी में मल भरा रहेगा तो वायु की गति सही तरीक़े से नही होगी। इसलिए प्राणायाम से पहले नाड़ी शुद्धि कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही प्राणायाम का सही लाभ पाने के लिए आहार और विहार का भी समुचित ध्यान रखने से प्राणायाम का लाभ सही तरीक़े से प्राप्त किया जा सकता है।
नाड़ी शुद्धि कैसे करें ?
नाड़ी शुद्धि दो प्रकार की होती है।
1- समनु
जब नाड़ी शुद्धि किसी बीज मंत्र के द्वारा की जाए तो इसे समनु शुद्धि कहते है।
2- निर्मनु
जब नाड़ी शुद्धि बिना बीज मंत्र के षट् कर्म के द्वारा की जाए तो उसे निर्मनु कहते है।षट् कर्म के अंतर्गत धौति, बस्ति, नेति, लौली, त्राटक और कपालभाति ये 6 प्रकार के कर्म आते है जिनके द्वारा साधक नाड़ी का शोधन करते हैं।
इसके लिए साधक को आसान में बैठ कर गुरु के सिखाए गए तरीक़े से नाड़ी शुद्धि करनी चाहिए। सबसे पहले बायीं नाक से वायु को अंदर खींचना चाहिए। बायीं नासिका में चंद्र नाड़ी होती है। इस वायु को दाहिनी नासापुट से निकालना चाहिए। नाभि के मूल से वायु को खींच कर दाहिनी नासापुट कुम्भक करना चाहिए फिर बाएँ नासापुट से रेचक करना चाहिए। इस प्राकार नाड़ी शुद्धि करने के बाद ही प्राणायाम करना चाहिए।
अभ्यास कहाँ करें ?
प्राणायाम का पूरा लाभ लेने के लिए ऐसे जगह पर अभ्यास करना चाहिए जहां किसी तरह की कोई बाधा न उत्पन्न हो। इसके लिए किसी शांत एवं साफ़ सुथरी जगह का चयन करना चाहिए। अभ्यास के स्थान पर किसी प्रकार के कीट पतंगे नहीं होने चाहिए। इसके लिए उस जगह का धूपन किया जा सकता है। इससे कीड़ों का भय भी समाप्त होता है और सुगंध भी रहती है। आयुर्वेद में धूपन करने के लिए अनेक प्रकार के योगों का वर्णन है जिनका प्रयोग किया जा सकता है अन्यथा सामान्य धूप का भी प्रयोग कर सकते हैं।
सुदेशे धार्मिके राज्ये सुभक्ष्ये निरुपद्रवे।
कुटी तत्र विनिर्माय प्राचीरै: परिवेष्टितम्।
कभी भी निर्जन स्थान पर, बहुत ज़्यादा भीड़ वाली जगह पर अभ्यास नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से सही परिणाम नहीं मिलते हैं। कुछ लोग प्रदर्शन करने के लिए नदी, पर्वत, झरनों आदि पर अभ्यास करते हैं जो उचित नहीं है।
दूरदेशे तथारण्ये राजधान्यां तथान्तिके ।
योगारम्भम न कुर्वीत कृतेच सिद्धिहा भवेत्।।
अविश्वासं दूरदेशे अरण्ये रक्षि वर्जितम्।
लोकाकुले प्रकाशश्च तस्मात त्रीणिविवर्जयेत्। ।
अभ्यास का समय :-
प्राणायाम का अभ्यास ऐसे समय करना चाहिए जब न तो अधिक गर्मी हो और ना ही अधिक सर्दी हो। अभ्यास करने के लिए प्रातः या सायं का समय सबसे उचित होता है।
साधक का भोजन कैसा हो ?
प्राणायाम का अभ्यास करते समय भोजन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जो लोग बिना भोजन में सावधानी रखे योग का अभ्यास करते हैं उन्हें अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं।
मिताहारं बिनायास्तु योगारंभ तु कारयेत।
नानारोगाभवन्त्यस्य किंचिद्योगो न सिध्यति ।।
इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसा भोजन किया जाए जो आसानी से पच जाए। शरीर में भारीपन न उत्पन्न करे। अधिक तली भुनी चीजों, जंक फ़ूड आदि के प्रयोग से साधक को बचना चाहिए। आटे में जौ का आटा अच्छा होता है इससे पेट भी ठीक रहता है और वज़न भी कम होता है। हरी पत्तेदार सब्ज़ियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए। दाल में मूँग की दाल सबसे उत्तम होती है। इसके अतिरिक्त उड़द, चना का भी प्रयोग किया जाना चाहिए। दालों का प्रयोग छिलका उतारे बिना करना चाहिए। ऐसे साग जो ताजे हों और जिनका मौसम हो उनका प्रयोग ठीक रहता है।
प्राणायाम के चिकित्सकीय लाभ:-
प्राणायाम का प्रयोग केवल स्वस्थ रहने के लिए ही नही किया जाता है बल्कि कई बीमारियों में भी प्राणायाम के लाभप्रद परिणाम देखे गए हैं।
- प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से श्वसन तंत्र से सम्बंधित अनेक बीमारियों में लाभ मिलता है। विशेष कर के ऐसे लोग जो लम्बे समय से धूम्रपान कर रहे हैं या जिन्हें साँस सम्बंधित गम्भीर बीमारियाँ जैसे दमा, टी बी आदि है उन्हें नियमित प्राणायाम करने से काफ़ी लाभ होता है।
- प्राणायाम खिलाड़ियों में क्षमता वृद्धि करने में भी सहायक होता है। जैसा कि हम जानते हैं खिलाड़ियों को श्वसन तंत्र मज़बूत रखना होता है जिससे उनमें स्टेमिना बना रहे। इस काम में प्राणायाम के अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं।
- ऐस रोगी जिन्हें उच्च रक्त चाप की समस्या रहती है वे प्राणायाम के अभ्यास से अपने रक्त भार को नियंत्रित रख सकते हैं। प्राणायाम से एकाग्रता उत्पन्न होती है जिसके कारण मानसिक शांति आती है और रक्त भार कम करने में सहायता मिलती है।
इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि अगर सही प्रकार से प्राणायाम का अभ्यास किया जाए तो मानसिक और शारीरिक दोनो प्रकार के लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
About The Author:-
Vaidya Chandra Chud Mishra is known for his special approach and clinical skills in the field of Ayurveda. He has written many articles on Ayurveda and Yoga. His books written on the subjects of Yoga and Ayurveda are very popular among students and doctors. He has extensive experience in management of life style disorders with comprehensive classical approach of Ayurveda. He has helped many patients to successfully control diabetes, high blood pressure, liver disorders, skin disorders and obesity as per the Ayurvedic lifestyle.For the purpose of propagating Ayurveda, he has organized many camps during his student days. To make his experiences easily known to the society, he started running Jiyofit Ayurved. Apart from this, his hobby is to write regularly on various social media platforms and share content related to Ayurveda.
Presently he is working in the field of Nadi Vigyan, practical application of dietary principals of Ayurveda and treatment of diseases with the integration of Ayurveda and Astrology.
M.D. National Institute of Ayurveda, Jaipur, Rajasthan, 2013
B.A.M.S. Kanpur University, Uttar Pradesh,2006
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References
Rig veda , Dayanand Samsthan, New Delhi Shabda kalpadrum Vachaspatyam Amar kosh, Pt Harigovind Shastri, Chaukhambha Sanskrit Sansthan Vns 2012 Sam Ved, Dayanand Samsthan, New Delhi Yajur Ved , Dayanand Samsthan, New Delhi Mahabharat, M.N. Dutta, Parimal Prakashan, Delhi, 1988 Manu Smriti, Dr. R.N.Sharma,Chaukhambha Sanskrit Prakashan, Delhi, 1998 Charaka Saṃhitā,Chaukhambha Oriantalia Vns 2008 Ashtang Samgrah, Dr. R.D. Tripathi, Chaukhambha Sanskrit Prakashan, Delhi,2001 Bhav Prakash, Dr.Bulusu sitaram, Chaukhambha Oriantalia Vns 2012 ,517 Sushrut Samhita, Prof. K.R. Srikant Murthy, Chaukhambha Oriantalia Vns 2000 Harit Samhita, Harihar Prasad Tripathi, Chaukhambha Krishnadas, Vns.,2009
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