आयुर्वेद के अनुसार अम्लपित्त से कैसे बचें
Vd. Chandra Chud Mishra , M.D. ( Ayurved ) (National Institute of Ayurveda, Jaipur)
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क्या है अम्लपित्त ?
खान-पान की गलत आदतों और जीवनशैली में बदलाव के कारण लोगों में एसिडिटी की समस्या एक आम परेशानी हो गयी है।रोगी अधिकांश कलेजे में जलन, सर में भारीपन, गैस, खट्टे ढकार की समस्याओं के साथ चिकित्सक के पास आता है। कई बार तो यह समस्या इतनी गम्भीर होती है कि बिना उपचार के रोगी अपनी सामान्य दिनचर्या भी नहीं जारी रख पाता है।आयुर्वेद की दृष्टि से इन लक्षणो को अम्लपित्त के संदर्भ में देखना उचित रहता है। इतनी बड़ी समस्य के समाधान के रूप में कुछ औषधियों का नियमित सेवन और परहेज़ इसके अतिरिक्त कोई समाधान दिखाई नही देता है। लेकिन आयुर्वेद में वर्णित जीवनशैली और आहार विहार में कुछ मूलभूत परिवर्तनों के साथ इस व्याधि के रोगियों में अच्छे परिणाम देखने को मिले है। इस लेख के माध्यम से इन्ही उपायों पर एक प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।
क्या है अम्लपित्त :-
अम्लपित्त एक ऐसी व्याधि है जिसमें रोगी का भोजन ठीक से नही पचता है। जिसके कारण उसे सामान्य तौर पर खट्टी ढकारें, पेट, छाती, और गले में जलन, पेट में भारीपन, भूख नही लगना, काम में मन नही लगना आदि अनेक लक्षण आते हैं। ऐसे ही लक्षण Hyperacidity और अन्य कई परिस्थितियों में भी मिलते है। यही कारण है कि आजकल रोगी की complain एसिडीटी की होती है। लेकिन यह आयुर्वेद के चिकित्सक का दायित्व है की वो रोगी की परेशानी को सही प्रकार से समझ कर रोग का निर्णय करे।
आयुर्वेद अम्लपित्त को आमाशय से उत्पन्न होने वाली व्याधि ( आमाशयोत्थ व्याधि ) मानता है। वैसे भी अम्लपित्त के अधिकांश लक्षण पाचन तंत्र से ही सम्बंधित होते है।
अम्लपित्त के कारण:-
विरोधी आहार द्रव्यों का सेवन, खट्टे आहार द्रव्यों का अधिक सेवन, अधिक मसालेदार भोजन, पित्त दोष को कुपित करने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन ये सभी अम्लपित्त को उत्पन्न करने के प्रमुख कारण बताए गए है। इसके अलावा स्वाभाविक रूप से ऐसे क्षेत्र जिन्हें आयुर्वेद में आनूप देश की श्रेणी में रखा जाता है उनमें अम्लपित्त के रोगी अधिक देखने को मिलते है। यही कारण है की रोगी का निवास स्थान पूछना उसके इतिवृत्त का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इसी तरह वर्षा ऋतु और शरद ऋतु में अम्लपित्त के रोगियों की संख्या अधिक हो जाती है।
अम्लपित्त का स्थान और समय से सम्बंध :-
यह देखा गया है कि ऐसे भोगौलिक क्षेत्र जहां वातावरण में नमी की मात्रा अधिक रहती हो जिसे आयुर्वेद में आनूप देश कहा गया है वहाँ अम्लपित्त के रोगी अधिक मिलते हैं। ऐसे ही वर्ष का वो समय जिसमें वातावरण में नमी अधिक होती है उसमें भी अम्लपित्त के रोगी बढ़ जाते है। यही कारण है कि वर्षा और शरद ऋतु में स्वाभाविक रूप से अम्लपित्त के रोगियों की संख्या बढ़ जाती है।मोटे तौर पर कहा जाए तो ऐसा स्थान जहां आर्द्रता की अधिकता हो या ऐसा मौसम जिसमें आर्द्रता अधिक होती हो उसमें अम्लपित्त की परेशानी अधिक होती है।
अम्लपित्त के सामान्य लक्षण:-
अन्न का सही से पाचन नहीं होना, बिना परिश्रम किए ही थकान का अनुभव होना , उबकाई आना , खट्टी या तिक्त ढकार आना , शरीर भारी लगना , सीने और गले में जलन होना , अन्न में रुचि समाप्त हो जाना ये सभी अम्लपित्त के सामान्य लक्षण माने जाते हैं।
अम्लपित्त से कैसे बचें:-
अम्लपित्त से बचने के लिए सही खान पान और दिनचर्या का पालन करना बहुत आवश्यक होता है। केवल कुछ ज़रूरी बातों का ध्यान रख कर बड़ी असानी से अम्लपित्त जैसी गम्भीर समस्या से बचा जा सकता है।
1- खाने के समय का ध्यान रखें:-
अधिक व्यस्तताओं के कारण कई बार हम समय से खाना नही खाते। इस का परिणाम तुरंत दिखे ना दिखे लेकिन लम्बे समय तक ऐसा करने से शरीर की पाचन प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार एक बार भर पेट भोजन करने के बाद 3 घंटे तक पुनः भोजन नहीं करना चाहिए । इससे भोजन को सही से पचने का समय मिलता है। ऐसा नहीं करने से अध्यशन की स्थिति उत्पन्न होती है जो कि पाचक अग्नि को बिगाड़ कर अनेक बीमारियों को उत्पन्न करती है।
ऐसे ही 6 घंटे से अधिक समय तक ख़ाली पेट रहने की आदत भी पाचन क्रिया पर दुष्प्रभाव डालती है।
याम मध्ये न भोक्तव्यम याम युग्मम न लंघयेत ।
2- पर्याप्त मात्रा में पानी पिएँ:-
पानी भोजन के पाचन के लिए बहुत अनिवार्य है। पानी भोजन को गीला करता जिससे पाचक रसों द्वारा सही प्रकार से भोजान का पाक किया जाता है। इसलिए सही मात्रा में पानी पीना अच्छे पाचन के लिए आवश्यक है।
3- अपनी आवश्यकता के अनुसार ही भोजन करें:-
प्रत्येक शरीर की ऊर्जा आवश्यकता अलग होती है। यहाँ तक कि एक ही व्यक्ति को अलग अलग समय पर अलग अलग भोजन की आवश्यकता होती है। इसलिए भोजन की मात्रा और गुणवत्ता का निर्धारण अपनी शरीर की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर करना चाहिए।
4- भागते हुए भोजन न करें:-
भोजन हमारे शरीर की मूलभूत आवश्यकता है। इसलिए हमें भोजन के लिए पर्याप्त समय निकलना ज़रूरी है। अक्सर देखा गया है कि लोग कम के चक्कर में जल्दी जल्दी भोजन करते हैं। ऐसा करने से भोजन का शाई प्रकार से पाचन प्रभावित होता है। इसलिए आराम से बैठ कर भोजन करना चाहिए। कहा भी गया है “ तन्मना भुंजीत ” ।
5- मसालों का संतुलित प्रयोग:-
मसाले केवल स्वाद के लिए प्रयोग नही किए जाते हैं बल्कि बहुत से मसाले पाचन तंत्र को मज़बूत बनाते हैं। इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि मसालों का सही मात्रा में प्रयोग किया जाए। अधिक मसालेदार भोजन भी आतों की शलैश्मिक कला को नुक़सान पहुँचता है।
अम्लपित्त में लाभदायक सब्ज़ियाँ :-
अम्लपित्त में तिक्त रस वाले आहार द्रव्य जैसे परवल, करेला का सेवन करना चाहिए। पका हुआ कद्दू, ककोड़, हुलहुल तिलवण (Tilvan) का साग, केले के फूल का प्रयोग अम्लपित्त के रोगियों में लाभदायक होता है ।
आटा:-
जौ का आटा पाचन प्रक्रिया को सुधारता है। अतः आटे के रूप में जौ के आटे का प्रयोग किया जा सकता है।
दाल:-
अम्लपित्त का रोगी मूँग की दाल, मसूर की दाल का प्रयोग कर सकता है। उड़द की दाल, तुर की दाल, मटर की दाल चने की दाल अम्लपित्त के रोगियों के लिए पथ्य नहीं होती है।
फल:-
आँवला, अनार, कैथ के फल अम्लपित्त के रोगियों के लिए लाभदायक होते है।
*यह लेख केवल आयुर्वेद के प्रचार प्रसार को ध्यान में रख कर लिखा गया है। किसी भी औषधि का प्रयोग योग्य चिकित्सक की देखा रेख में किया जाना चाहिए।
About The Author:-
Vaidya Chandra Chud Mishra is known for his special approach and clinical skills in the field of Ayurveda. He has written many articles on Ayurveda and Yoga. His books written on the subjects of Yoga and Ayurveda are very popular among students and doctors. He has extensive experience in management of life style disorders with comprehensive classical approach of Ayurveda. He has helped many patients to successfully control diabetes, high blood pressure, liver disorders, skin disorders and obesity as per the Ayurvedic lifestyle.For the purpose of propagating Ayurveda, he has organized many camps during his student days. To make his experiences easily known to the society, he started running Jiyofit Ayurved. Apart from this, his hobby is to write regularly on various social media platforms and share content related to Ayurveda.
Presently he is working in the field of Nadi Vigyan, practical application of dietary principals of Ayurveda and treatment of diseases with the integration of Ayurveda and Astrology.
M.D. National Institute of Ayurveda, Jaipur, Rajasthan, 2013
B.A.M.S. Kanpur University, Uttar Pradesh,2006
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References
Rig veda , Dayanand Samsthan, New Delhi Shabda kalpadrum Vachaspatyam Amar kosh, Pt Harigovind Shastri, Chaukhambha Sanskrit Sansthan Vns 2012 Sam Ved, Dayanand Samsthan, New Delhi Yajur Ved , Dayanand Samsthan, New Delhi Mahabharat, M.N. Dutta, Parimal Prakashan, Delhi, 1988 Manu Smriti, Dr. R.N.Sharma,Chaukhambha Sanskrit Prakashan, Delhi, 1998 Charaka Saṃhitā,Chaukhambha Oriantalia Vns 2008 Ashtang Samgrah, Dr. R.D. Tripathi, Chaukhambha Sanskrit Prakashan, Delhi,2001 Bhav Prakash, Dr.Bulusu sitaram, Chaukhambha Oriantalia Vns 2012 ,517 Sushrut Samhita, Prof. K.R. Srikant Murthy, Chaukhambha Oriantalia Vns 2000 Harit Samhita, Harihar Prasad Tripathi, Chaukhambha Krishnadas, Vns.,2009
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